भालू के आतंक से दहशत का माहौल,वन विभाग की निष्क्रियता पर उठ रहे सवाल
रसमोहनी/जैतपुर।
जैतपुर वन परिक्षेत्र अंतर्गत रसमोहनी क्षेत्र इन दिनों जंगली भालू की बढ़ती गतिविधियों के कारण दहशत में है। ताज़ा घटना में बाजार स्थित पवन किराना स्टोर के सीसीटीवी कैमरे में देर रात एक भालू स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, जिसके बाद आसपास के गांवों में भय और असुरक्षा की स्थिति और गहरी हो गई है। स्थानीय निवासियों ने इसे “वन विभाग की लगातार लापरवाही” का परिणाम बताया है और सुरक्षा व्यवस्थाओं को लेकर विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।
सीसीटीवी में कैद हुआ भालू—बाजार तक पहुंचना गंभीर संकेत
सीसीटीवी फुटेज में भालू को बाजार के मुख्य मार्ग पर आराम से घूमते देखा गया। घटना रात के उस समय की है, जब दुकानें बंद होने के बाद व्यापारी और मजदूर अक्सर घरों को लौटते हैं। ग्रामीणों ने बताया कि फुटेज सामने आने के बाद लोग देर शाम और रात के समय बाजार की ओर जाने से बच रहे हैं। व्यापारियों ने रात में दुकान बंद करने के दौरान अतिरिक्त सतर्कता बरतना शुरू कर दिया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह घटना कोई पहली नहीं है। पिछले कुछ हफ्तों से रसमोहनी, खैरहनी और आसपास के क्षेत्रों में भालू को कई बार देखा गया है। बावजूद इसके, वन विभाग द्वारा न तो कोई आधिकारिक चेतावनी जारी की गई और न ही क्षेत्र को संवेदनशील घोषित किया गया।
पहले से कई हमले व मौतें, फिर भी कोई प्रभावी कदम नहीं
क्षेत्र के ग्रामीणों का दावा है कि पिछले एक वर्ष में भालू के हमलों में कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए और कुछ घटनाओं में जनहानि भी हुई है। इसके बावजूद वन विभाग की ओर से कोई दीर्घकालिक रणनीति नहीं अपनाई गई। न तो निगरानी दल सक्रिय किया गया, न ही कोई विशेष टीम भेजी गई। ऐसे में ग्रामीण विभाग की भूमिका पर सवाल उठाना उचित मानते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि वन्यजीवों की गतिविधियों में अचानक वृद्धि सामान्य संकेत नहीं होता। यह या तो खाद्य संकट, वन क्षेत्र में अतिक्रमण, या मानव–वन्यजीव संघर्ष का बढ़ता दायरा दर्शाता है। ऐसे में विभाग को सक्रिय निगरानी, बचाव दल और अविलंब सूचना तंत्र लागू करना आवश्यक था, जो अब तक नहीं किया गया।
ग्रामीणों का आरोप—“सूचना देने के बाद भी नहीं पहुंचती विभागीय टीम”
रसमोहनी और जैतपुर क्षेत्र के कई ग्रामीणों ने बताया कि भालू की जानकारी विभाग को कई बार फोन पर दी गई, लेकिन वन विभाग की टीम मौके पर देर से पहुंची या कई बार पहुंची ही नहीं। लोगों का कहना है कि विभाग का जवाब हमेशा एक जैसा रहता है—“टीम भेजी जा रही है”—लेकिन वास्तविकता इसके उलट है।
कई ग्रामीणों ने बताया कि भालू के हमले के बाद पीड़ितों को राहत प्रदान करने की प्रक्रिया भी अत्यंत धीमी है। न तो समय पर पंचनामा तैयार होता है, न ही मुआवजा प्रक्रिया को त्वरित किया जाता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि विभाग इतनी उदासीनता न बरतता, तो कई घटनाओं को टाला जा सकता था।
सुरक्षा के लिए त्वरित कदम उठाने की मांग
ग्रामीण व स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने संयुक्त रूप से विभाग के सामने कई आवश्यक मांगें रखी हैं—
1. प्रभावित क्षेत्रों को तत्काल भालू संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जाए।
2. रात के समय वन सुरक्षा गश्ती दल तैनात किए जाएँ।
3. विशेषज्ञ वन्यजीव बचाव दल को बुलाकर भालू को सुरक्षित क्षेत्र में ले जाया जाए।
4. गांवों में जागरूकता कार्यक्रम, सुरक्षा दिशानिर्देश और त्वरित सूचना तंत्र विकसित किया जाए।
5. भालू हमले के पीड़ितों को शीघ्र और पारदर्शी मुआवजा प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि वे केवल कार्रवाई का आश्वासन नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस पहल देखना चाहते हैं।
प्रशासनिक तत्परता अब अनिवार्य
रसमोहनी बाजार जैसे भीड़भाड़ वाले क्षेत्र में भालू का पहुंचना स्वयं में अत्यंत गंभीर स्थिति का संकेत है। यह स्पष्ट तौर पर दर्शाता है कि वन सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हो रही है और क्षेत्र में वन्यजीवों की गतिविधियों पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं है। यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में किसी बड़ी दुर्घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन और वन विभाग से आग्रह किया है कि वे इस मुद्दे को प्राथमिकता पर लें और उचित सुरक्षा उपाय तत्काल लागू करें। ग्रामीणों का कहना है कि उनके लिए रोजमर्रा की गतिविधियाँ भी अब जोखिमपूर्ण हो गई हैं और विभाग को यह समझना चाहिए कि हर देरी संभावित खतरे को बढ़ाती है।
कुल मिलाकर, रसमोहनी और आसपास के क्षेत्रों में भालू की मौजूदगी को लेकर भय बढ़ता जा रहा है, और इस परिस्थिति में वन विभाग की निष्क्रियता सीधे तौर पर जन सुरक्षा को प्रभावित कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समय सक्रिय निगरानी और त्वरित कार्रवाई का है, न कि शिथिलता का।

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