रेत माफिया अफसर अली के आगे बेबस सिस्टम! छोटे ट्रैक्टरों पर कार्रवाई, बड़े पर मेहरबानी क्यों?
जैतपुर क्षेत्र में अवैध रेत उत्खनन और परिवहन का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। तितरा–कुनुक नदी घाटियों से रात-दिन रेत निकासी के आरोपों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है सूत्रों का कहना है,कुख्यात रेत कारोबारी अफसर अली दवा करते घूम रहा की स्थानीय थाना प्रभारी मेरे रिश्तेदार क्या सच में अफसर अली वा थाना प्रभारी के बीच कोई वास्तविक रिश्ता या “सेटिंग” है, या फिर यह महज़ अफ़वाह है? अगर रिश्ता नहीं है, तो फिर प्रशासनिक कार्रवाई का पैमाना दोहरा क्यों दिखता है?
स्थानीय ग्रामीणों और ट्रैक्टर मालिकों का आरोप है कि अफसर अली के वाहनों पर कथित तौर पर कोई सख़्त कार्रवाई नहीं होती, जबकि छोटे ट्रैक्टर मालिकों पर लगातार जुर्माने, जब्ती और मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। यह विरोधाभास अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। क्या नियम केवल कमजोरों के लिए हैं? या फिर कहीं न कहीं कोई अदृश्य संरक्षण काम कर रहा है?
सूत्रों के अनुसार, अवैध रेत परिवहन के लिए मार्ग, समय और निगरानी—सब कुछ “मैनेज” होने की चर्चा आम है। यदि यह सही है, तो फिर सवाल उठता है कि यह सेटिंग किस स्तर पर है—थाना, बीट प्रभारी, माइनिंग विभाग या इससे ऊपर? माइनिंग विभाग की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। यदि अफसर अली को खुलेआम छूट है, तो क्या यह विभागीय मिलीभगत का परिणाम है? या फिर जांच और प्रवर्तन में लापरवाही?
ग्रामीण बताते हैं कि जिन घाटों पर कार्रवाई होनी चाहिए, वहां लंबे समय तक कोई टीम नहीं पहुंचती। जब कभी औपचारिक छापेमारी होती भी है, तो वह सीमित रहती है—मानो पहले से सूचना पहुंच चुकी हो। इसके उलट, छोटे ट्रैक्टर मालिकों को रोक-रोक कर कार्रवाई की जाती है, जिससे यह संदेश जाता है कि “बड़े” सुरक्षित हैं और “छोटे” निशाने पर।
थाना प्रभारी के साथ रिश्ते की चर्चा पर पुलिस पक्ष से आधिकारिक तौर पर कोई स्पष्ट, लिखित खंडन सामने नहीं आया है। यदि यह महज़ अफ़वाह है, तो पारदर्शिता के लिए आवश्यक है कि प्रशासन तथ्यों के साथ सामने आए—सीसीटीवी, जीपीएस, चालान, जब्ती और केस डायरी के आंकड़े सार्वजनिक करे। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि कार्रवाई निष्पक्ष है या नहीं।
बीट प्रभारी की भूमिका भी सवालों में है। बीट स्तर पर निगरानी सबसे प्रभावी मानी जाती है। यदि बीट में अवैध गतिविधियां फल-फूल रही हैं, तो या तो निगरानी विफल है या फिर मिलीभगत। दोनों ही स्थितियां गंभीर हैं और उच्च स्तरीय जांच की मांग करती हैं।
इस पूरे तंत्र में सबसे अधिक नुकसान पर्यावरण और ईमानदार नागरिकों का हो रहा है। नदी का अस्तित्व, जलस्तर और ग्रामीण जीवन—all खतरे में हैं। अवैध रेत से सरकारी राजस्व का नुकसान अलग।
अब आवश्यकता है कि जिला प्रशासन, माइनिंग विभाग और पुलिस संयुक्त रूप से स्वतंत्र जांच कराए। सभी वाहनों की समान जांच, घाटों की सैटेलाइट/ड्रोन निगरानी, और कार्रवाई की सार्वजनिक रिपोर्टिंग अनिवार्य की जाए। यदि अफसर अली पर लगे आरोप निराधार हैं, तो यह जांच उन्हें भी क्लीन चिट देगी। और यदि आरोप सही हैं, तो दोषियों पर बिना भेदभाव कड़ी कार्रवाई ही जनता का भरोसा बहाल कर सकती है।
सवाल स्पष्ट है—कानून सबके लिए बराबर या फिर कुछ के लिए विशेष? जवाब प्रशासन को देना होगा।
और अंत में पुलिस चाहे तो अपराधियों को गड़े जमीन से निकाल ले, क्या अफसर अली का रेत कारोबार बंद नहीं हो सकता

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