क्या गुड़िया बैगा सिर्फ दिखाने के लिए अध्यक्ष , क्या सदस्य और गुड़िया बैगा को भ्रम में रख सास ने अपने बहु को बना दिया अध्यक्ष
सास सचिव थी—क़लम उसकी,
बहु अध्यक्ष बनी—कुर्सी उसकी,
और लड़का बैठा धान केंद्र में,
घोटाले की चाबी उसी की!
स्व सहायता समूह पुड़िया नाम,
अंदर खेल—पूरा बदनाम!
जनता को पकड़ा दिया गया झुनझुना,
और लूट का मेला रोज़ लगा!
कब खाता बदला—किसी ने देखा?
कब अध्यक्ष बदली—किसी ने जाना?
इतना सन्नाटा कि तारीख भी बोली—
“भइया, हमसे मत पूछो, हमें भी नहीं पता!”
दूसरे सेक्टर से घुस आई लूट,
किसानों की आबरू हुई तार-तार,
धान नहीं—इज्जत तौली गई,
और चुप बैठा रहा पूरा दरबार!
पटेल साहब—खाद्य आपूर्ति अधिकारी,
नाम सुनते ही लुटेरों की बारी!
पूर्ण संरक्षण की ऐसी छाया,
कि घोटाले को भी डर न आया!
सुना है साहब कोर्ट से स्टे लाए,
फिर न किसी का खौफ रह जाए!
अब न कानून, न नियम का डर,
किसान ही बना सबसे आसान शिकार!
खुली मांग, खुले ऐलान—
“100 बोरी धान लाओ किसान,
तो 1 बोरी हमारी होगी—
ये नियम है, ये परंपरा है जनाब!”
किसान पूछे—“ये लूट है या टैक्स?”
जवाब मिला—“चुप रहो, नहीं तो सेंटर बंद!”
ये व्यवस्था नहीं,
ये लाइसेंसी लूट है!
ये शासन नहीं,
ये खानदानी रूट है!
अब कविता चेतावनी बन गई है,
अब मंच सवाल बन गया है—
या तो घोटाला बंद होगा,
या किसान सड़कों पर उतर जाएगा!
जय किसान!
झुनझुना नहीं—हिसाब चाहिए!
रिश्तेदारी राज नहीं चलेगा—नहीं चलेगा!

Leave a Reply