शहडोल : बाणगंगा मेला या डांस बार? सनातन संस्कृति पर फूहड़ता का खुला हमला, नगर पालिका की भूमिका कटघरे में
पंडित कृष्णा मिश्रा पत्रकार शहडोल ✍️✍️
करीब 125 वर्षों की पौराणिक, ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत को समेटे शहडोल का प्रसिद्ध बाणगंगा मेला आज गंभीर सवालों के घेरे में है। कभी यह मेला भजन-कीर्तन, लोकगीत, पंडवानी और सनातन संस्कृति की जीवंत मिसाल हुआ करता था, लेकिन वर्तमान समय में यह मेला अश्लील गानों, अर्धनग्न नृत्यों और फूहड़ प्रस्तुतियों के कारण अपनी पहचान खोता नजर आ रहा है। स्थानीय लोगों का साफ कहना है कि यह मेला अब संस्कृति का मंच नहीं, बल्कि डांस बार का रूप ले चुका है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शहडोल राजा विराट की नगरी रही है, जहां पांडवों ने अपने अज्ञातवास का एक वर्ष व्यतीत किया था। विराट मंदिर और बाणगंगा क्षेत्र में आज भी अनेक पुरातात्विक साक्ष्य मौजूद हैं, जो शहडोल को पर्यटन की दृष्टि से विशेष महत्व प्रदान करते हैं। इसके बावजूद प्रशासनिक लापरवाही और नगर पालिका परिषद शहडोल की अनदेखी के चलते यह ऐतिहासिक मेला धीरे-धीरे अश्लीलता और अभद्रता के दलदल में फंसता जा रहा है।
मकर संक्रांति के अवसर पर हर वर्ष आयोजित होने वाले सात दिवसीय बाणगंगा मेले में प्रतिदिन शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। लेकिन बीते चार वर्षों से लगातार इन मंचों से “पीले-पीले होठों से शराब बन जाऊंगी”, “लड़की पटा ले बबुआ” जैसे गानों पर नृत्य कराए जा रहे हैं। स्थानीय सनातनी समाज का कहना है कि ऐसी प्रस्तुतियां सनातन धर्म की भावनाओं का खुलेआम अपमान हैं।
लोगों का आरोप है कि बाणगंगा मेला और विराट मंदिर उनकी आस्था के केंद्र हैं, जहां केवल सनातन परंपरा से जुड़े कार्यक्रम—भजन, जागरण, कीर्तन, पंडवानी—ही होने चाहिए थे, लेकिन नगर पालिका परिषद ने इसके विपरीत फूहड़ और स्तरहीन कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया। इससे न सिर्फ धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं, बल्कि इस ऐतिहासिक मंच की साख भी दांव पर लग गई है।
स्थिति को और गंभीर बनाता है विराट मंदिर के बेहद पास कंपोजिट शराब दुकान का होना। आरोप है कि दुकान के सामने खुलेआम शराब का सेवन होता है, जबकि उसी रास्ते से बच्चे, महिलाएं और श्रद्धालु गुजरते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि नगर पालिका परिषद को यहां बैरिकेडिंग कर शराब दुकान को कवर करना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
मेले की व्यवस्थाओं को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। नगर पालिका द्वारा मेले में बड़े-बड़े जनप्रतिनिधियों के होर्डिंग्स तो लगाए गए, लेकिन कहीं भी इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर, सुरक्षा मापदंड, दुकानदारों की रेट-लिस्ट या वाहन स्टैंड की दरें नहीं लिखी गईं। यह सीधी-सीधी प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है।
इसके अलावा, मेले में दुकानों के आवंटन को लेकर भी असंतोष है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि हर साल एक बाहरी दुकान—जैन कल्पना रेस्टोरेंट—को सबसे अधिक क्षेत्रफल में दुकान लगाने की अनुमति दी जाती है, जबकि स्थानीय व्यापारियों को सीमित जगह मिलती है। सूत्रों के अनुसार दुकान का संचालन किसी भदौरिया नामक व्यक्ति द्वारा किया जाता है, जिसकी अनुमति प्रक्रिया भी जांच का विषय है।
सूत्र यह भी बताते हैं कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए करीब लाखों रुपये का टेंडर हुआ था, जिसमें भ्रष्टाचार कर ऐसी टीमों को मंच दिया गया, जिनसे नगर पालिका को कथित लाभ मिल सके। इन आरोपों ने नगर पालिका परिषद शहडोल की भूमिका को पूरी तरह संदेह के घेरे में ला दिया है।
इस मुद्दे पर विश्व हिंदू परिषद शहडोल के अध्यक्ष गोविंद सिंह परिहार ने कहा कि “संस्कृति और सनातन के खिलाफ इस तरह के अर्धनग्न डांस किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं हैं।” वहीं बाणगंगा मंदिर के मुख्य पुजारी अभिषेक द्विवेदी ने स्पष्ट कहा कि “मकर संक्रांति जैसे पवित्र पर्व पर आधे कपड़ों के नृत्य और कव्वाली कराना हमारी सनातन परंपरा नहीं है।”
अब बड़ा सवाल यह है कि आस्था के इस ऐतिहासिक मंच पर फूहड़ता कब तक चलती रहेगी? और जो खुद को धर्म और संस्कृति का ठेकेदार बताते हैं, वे इस मुद्दे पर अब तक खामोश क्यों हैं? स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि बाणगंगा मेले को उसकी मूल सनातन पहचान वापस दिलाई जाए और नगर पालिका परिषद की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच हो।

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