Updated On: 08 Oct, 2025

वैज्ञानिकों ने क्रोनिक फटीग सिंड्रोम के लिए बनाया दुनिया का पहला ब्लड टेस्ट, इलाज में मिलेगी बड़ी मदद

दुनियाभर में लाखों लोगों को प्रभावित करने वाली रहस्यमयी बीमारी क्रोनिक फटीग सिंड्रोम (ME/CFS) के इलाज में अब एक बड़ी उम्मीद की किरण जगी है। वैज्ञानिकों ने इस बीमारी की पहचान के लिए दुनिया का पहला ब्लड टेस्ट विकसित किया है, जिससे अब इसका निदान पहले से कहीं अधिक आसान और सटीक हो सकेगा।
अब तक इस बीमारी के लिए कोई स्पष्ट परीक्षण मौजूद नहीं था और मरीजों का इलाज केवल लक्षणों के आधार पर किया जाता था। इसी वजह से कई मरीज सालों तक गलत निदान और लापरवाही का शिकार होते रहे।
ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय (UEA) के नॉर्विच मेडिकल स्कूल के प्रोफेसर दिमित्री शेजेत्स्की ने बताया कि ME/CFS एक गंभीर और दुर्बल करने वाली बीमारी है, जिसमें मरीज को अत्यधिक थकान महसूस होती है, जो आराम करने से भी दूर नहीं होती। उन्होंने कहा कि कई मरीजों को डॉक्टरों ने गंभीरता से नहीं लिया और उनकी हालत को केवल मानसिक तनाव का परिणाम बताया।
कैसे काम करता है यह टेस्ट
UEA और ऑक्सफोर्ड बायोडायनामिक्स (OBD) के वैज्ञानिकों ने ME/CFS से पीड़ित मरीजों के DNA के मुड़ने (folding) के पैटर्न का अध्ययन किया। इस रिसर्च में 47 गंभीर रूप से बीमार मरीजों और 61 स्वस्थ वयस्कों के रक्त के नमूनों की जांच की गई। वैज्ञानिकों को एक ऐसा अनोखा DNA पैटर्न मिला जो केवल ME/CFS मरीजों में पाया गया और स्वस्थ लोगों में नहीं, जिससे इस टेस्ट का विकास संभव हुआ।
हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस टेस्ट को व्यापक उपयोग में लाने से पहले सावधानी और और अधिक परीक्षणों की जरूरत है। अगर यह टेस्ट बड़े स्तर पर सफल होता है, तो यह ME/CFS जैसी लंबे समय तक अनदेखी की गई बीमारी के इलाज में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है।