Updated On: 12 Oct, 2025

74 वर्षीय मोहन लाल ने जीवित रहते ही निकाली अपनी अंतिम यात्रा

बिहार के गया जिले के कोंची गांव में 74 वर्षीय मोहन लाल ने एक अनोखी घटना को अंजाम दिया। उन्होंने जीवित रहते ही अपनी अंतिम यात्रा निकाली और सबको हैरान कर दिया। बैंडबाजे और ‘राम नाम सत्य है’ के नारों के बीच मोहन लाल फूल-मालाओं से सजाए गए अर्थी पर लेटे हुए मुक्तिधाम तक पहुंचे। इस दौरान उनके पीछे “चल उड़ जा रे पंछी, अब देश हुआ बेगाना” गीत की धुन पूरे माहौल को भावुक बना रही थी।

मोहन लाल ने बताया कि इसका मुख्य उद्देश्य यह जानना था कि उनकी अंतिम यात्रा में कौन-कौन लोग शामिल होते हैं। उन्होंने कहा, “जब इंसान मर जाता है, तो यह देख नहीं पाता कि कौन आया। मैं यह दृश्य खुद देखना चाहता था और यह जानना चाहता था कि लोग मुझे कितना सम्मान और स्नेह देते हैं।”

अंतिम संस्कार और परंपराएँ

मुक्तिधाम पहुँचने के बाद मोहन लाल ने अर्थी से उठकर प्रतीकात्मक पुतला जलाया गया। इस दौरान सभी धार्मिक और परंपरागत नियमों का पालन किया गया। अंतिम संस्कार के बाद राख को नदी में प्रवाहित किया गया। इसके साथ ही मोहन लाल ने अंतिम यात्रा में शामिल लोगों के लिए सामूहिक भोज का भी आयोजन किया।

सामाजिक कार्यों में योगदान

मोहन लाल ने अपने जीवन में कई सामाजिक कार्य किए हैं। विशेष रूप से बरसात के दिनों में शवदाह की सुविधा के लिए उन्होंने अपने खर्च से गांव में सुविधायुक्त मुक्तिधाम बनवाया। ग्रामीणों का कहना है कि उनका यह कदम पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणास्रोत है।
मोहन लाल के परिवार में दो पुत्र हैं – डॉ. दीपक कुमार, जो कोलकाता में डॉक्टर हैं, और विश्व प्रकाश, जो 10+2 विद्यालय में शिक्षक हैं। उनकी बेटी गुड़िया कुमारी धनबाद में रहती हैं। उनकी पत्नी जीवन ज्योति 14 साल पहले गुजर चुकी हैं। मोहन लाल अपने पेंशन से इन सभी सामाजिक कार्यों को जारी रखते हैं।
इस अनोखे कदम और उनके सामाजिक योगदान ने मोहन लाल को न केवल गांव में बल्कि पूरे क्षेत्र में सम्मान और प्रेरणा का प्रतीक बना दिया है।